मुंबई की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में दिखी मज़हबी हमआहंगी की खूबसूरत तस्वीर
मुंबई से शिब्ली रामपुरी की रिपोर्ट
मुंबई की ऐतिहासिक जामा मस्जिद उस वक़्त एक खूबसूरत पैग़ाम-ए-मोहब्बत का मरकज़ बन गई, जब ‘प्रॉफिट फ़ॉर ऑल’ मुहिम के तहत मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब से ताल्लुक़ रखने वाले लोग मस्जिद पहुंचे। इस कार्यक्रम का मक़सद सिर्फ़ मस्जिद का परिचय कराना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के मज़हब, रवायतों और धार्मिक तौर-तरीक़ों को समझकर दिलों से गलतफ़हमियां दूर करना और आपसी भाईचारे को मज़बूत करना था।
इस ख़ास कार्यक्रम में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के परपौत्र तुषार गांधी समेत मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब से जुड़े लोग शामिल हुए। इनमें बड़ी तादाद महिलाओं की भी रही।
जामा मस्जिद पहुंचने पर तमाम मेहमानों का ख़ैरमक़दम किया गया। इसके बाद उन्हें मस्जिद के मुख़्तलिफ़ हिस्सों का दौरा कराया गया और इस्लामी तौर-तरीक़ों तथा मस्जिद की अहमियत के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
इस दौरान मेहमानों के ज़ेहन में मौजूद कई सवाल भी सामने आए। मस्जिद कमेटी से जुड़े लोगों ने इन सवालों के तफ़्सील से जवाब दिए और बताया कि इस्लाम में इबादत, मस्जिद और धार्मिक रवायतों का क्या मक़ाम है।
ख़ास बात यह रही कि बातचीत के दौरान उन गलतफ़हमियों पर भी खुलकर बात की गई, जो कभी-कभी जानकारी की कमी की वजह से एक-दूसरे के मज़हब या धार्मिक स्थलों के बारे में पैदा हो जाती हैं।
जामा मस्जिद पहुंचे विभिन्न धर्मों से जुड़े लोगों ने ‘प्रॉफिट फ़ॉर ऑल’ की इस पहल की खुले दिल से तारीफ़ की। उनका कहना था कि ऐसे कार्यक्रम आज के दौर में बेहद अहम हैं, क्योंकि जब लोग एक-दूसरे के मज़हब और धार्मिक स्थलों को क़रीब से समझते हैं तो गलतफ़हमियां कम होती हैं और दिलों में मोहब्बत, एहतराम और भाईचारे की जगह बनती है।
इस मौके़ पर जामा मस्जिद से जुड़े लोगों के अलावा मशहूर समाजसेवी आमिर इदरीसी, सईद ख़ान, शाकिर शेख समेत कई लोग मौजूद रहे।
*कई साल से जारी है मुहिम*
क़ाबिल-ए-ग़ौर है कि मुंबई में कई साल से ‘प्रॉफिट फ़ॉर ऑल’ मुहिम के तहत मुख़्तलिफ़ सामाजिक और भाईचारे से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी सिलसिले की एक अहम पहल ‘मस्जिद परिचय’ कार्यक्रम है।
इस कार्यक्रम के तहत मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब से जुड़े लोगों को मस्जिद में दावत दी जाती है, जहां उन्हें मस्जिद, इस्लामी रवायतों और इबादत के तौर-तरीक़ों के बारे में जानकारी दी जाती है। साथ ही मेहमानों को अपने सवाल खुलकर पूछने का मौक़ा दिया जाता है और उनके सवालों के जवाब भी तफ़्सील से दिए जाते हैं।
यक़ीनन, ऐसे कार्यक्रम उस वक़्त की ज़रूरत हैं जब समाज को एक-दूसरे से दूर करने वाली गलतफ़हमियों के बजाय एक-दूसरे को समझने की कोशिश की जाए।
मज़हब अलग हो सकते हैं, इबादत के तरीक़े अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत, मोहब्बत, एहतराम और भाईचारे का पैग़ाम सबको एक-दूसरे के क़रीब ला सकता है।
मुंबई की जामा मस्जिद से सामने आई यह तस्वीर इसी उम्मीद को मज़बूत करती है कि बातचीत के दरवाज़े खुले रहें, दिलों से गलतफ़हमियां दूर हों और मुल्क में अमन, मोहब्बत और भाईचारे की फ़िज़ा और मज़बूत हो।