मुसलमान का वोट चाहिए, लेकिन नेतृत्व नहीं? क्या उत्तराखंड कांग्रेस का यही है धर्मनिरपेक्ष मॉडल है?
डॉक्टर जमशेद उस्मानी
उत्तराखंड कांग्रेस ने आखिरकार छह साल बाद अपनी नई प्रदेश कार्यकारिणी का ऐलान कर दिया। चुनावी साल में घोषित इस सूची से उम्मीद थी कि पार्टी अपने सबसे भरोसेमंद समर्थकों को सम्मानजनक भागीदारी देगी। लेकिन जो तस्वीर सामने आई, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या कांग्रेस के लिए मुसलमान सिर्फ चुनावी मौसम का वोट बैंक हैं, राजनीतिक साझेदार नहीं?
संगठन में कुल 169 पदाधिकारी बनाए गए। इनमें सिर्फ नौ मुस्लिम हैं। यानी कुल प्रतिनिधित्व महज़ 5.39 प्रतिशत। यह आंकड़ा अपने आप में बहुत कुछ कहता है।
कांग्रेस को सबसे पहले इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि क्या उत्तराखंड में उसकी राजनीतिक ताकत भी केवल 5.39 प्रतिशत पर टिकी है? अगर नहीं, तो फिर उस समुदाय की हिस्सेदारी सिर्फ 5.39 प्रतिशत क्यों, जिसने वर्षों तक हर कठिन चुनाव में कांग्रेस के साथ खड़े होकर उसे राजनीतिक ऑक्सीजन दी?
2017 और 2022 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटर्स के बलबूते ही कांग्रेस अपना वजूद बचा पाई मुस्लिम बाहुल्य या मुस्लिम असर वाली विधानसभा सीटों पर अधिकांश कांग्रेस विधायक इन दो चुनाव में जीत पाए,
यह कोई पहली घटना नहीं है। उत्तराखंड में कांग्रेस करीब दस साल सत्ता में रही। लेकिन उस पूरे दौर में एक भी मुस्लिम विधायक को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। अब संगठन में भी वही कहानी दोहराई गई है। इससे यह संदेश जाता है कि कांग्रेस को मुसलमानों का वोट तो चाहिए, लेकिन सत्ता और संगठन में हिस्सेदारी नहीं देनी।
कांग्रेस बार-बार खुद को धर्मनिरपेक्षता की सबसे बड़ी प्रहरी बताती है। लेकिन क्या धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिर्फ मंचों से संविधान बचाने के भाषण देना है? क्या धर्मनिरपेक्षता केवल चुनावी सभाओं का नारा है? अगर नहीं, तो संगठन की सबसे अहम सूची में मुस्लिम प्रतिनिधित्व इतना सीमित क्यों है?
सबसे गंभीर बात यह है कि कांग्रेस शायद आज भी एक पुराने राजनीतिक भ्रम में जी रही है। उसे लगता है कि मुसलमानों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इसलिए उन्हें सम्मान मिले या उपेक्षा, टिकट मिले या न मिले, संगठन में जगह मिले या न मिले—आखिरकार वोट कांग्रेस को ही मिलेगा। यही सोच कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल भी हो सकती है।
तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने वर्षों तक मुस्लिम समाज से कहा—”भाजपा को हराना है, इसलिए हमारे साथ रहो।” लेकिन क्या कभी उन्होंने खुद से यह पूछा कि बदले में उन्होंने मुस्लिम समाज को क्या दिया? क्या बराबरी की भागीदारी? क्या नेतृत्व? क्या निर्णय लेने की शक्ति? या सिर्फ चुनावी मंचों से सिर्फ बातें?
अगर किसी समुदाय से सिर्फ वोट लेने का रिश्ता हो और सम्मान देने की बारी आए तो उसे पीछे बैठा दिया जाए, तो इसे राजनीतिक साझेदारी नहीं, बल्कि राजनीतिक उपयोग कहा जाएगा।
कांग्रेस को यह भी याद रखना चाहिए कि सम्मान की भी एक राजनीति होती है। जो समाज वर्षों तक आपके लिए मतदान केंद्रों तक जाता रहा, क्या उसे संगठन में सम्मानजनक प्रतिनिधित्व देना भी ज़रूरी नहीं समझा गया? अगर नहीं, तो फिर धर्मनिरपेक्षता का दावा नैतिक ताकत खो देता है।
सवाल केवल इतना है कि जिस समुदाय का समर्थन कांग्रेस की राजनीति का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है, क्या उसे उसी अनुपात में संगठन में भी सम्मान मिला? यदि उत्तर “नहीं” है, तो इस असंतुलन पर चर्चा होना लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा है।
उत्तराखंड कांग्रेस को तय करना होगा कि वह मुस्लिम समाज को अपना राजनीतिक भागीदार मानती है या केवल चुनावी मजबूरी। क्योंकि लोकतंत्र में वोट लेने का अधिकार तभी नैतिक बनता है, जब सम्मान और भागीदारी भी बराबरी की हो।
मुस्लिम समाज को भी अब यह सवाल पूछना चाहिए—क्या हर चुनाव में बिना शर्त समर्थन देने की राजनीति जारी रखनी चाहिए, या सभी राजनीतिक दलों से सम्मानजनक प्रतिनिधित्व और जवाबदेही की मांग करनी चाहिए? लोकतंत्र में वोट केवल किसी दल को जिताने का साधन नहीं, बल्कि सम्मान और हिस्सेदारी सुनिश्चित करने का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अधिकार भी है।