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उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण: शिक्षा सुधार या वैचारिक हस्तक्षेप?

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मदरसों का भविष्य: आधुनिक शिक्षा के साथ पहचान भी ज़रूरी

 शिक्षा का उद्देश्य अवसर बढ़ाना है, पहचान बदलना नहीं।

खुर्शीद अहमद सिद्दीकी, (गुलाम ए मुस्तफा)malaria education 

    उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को सक्रिय करने की पहल को शिक्षा जगत में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सरकार का तर्क है कि इस व्यवस्था से अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों, विशेषकर मदरसों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा और विद्यार्थियों को आधुनिक एवं रोजगारपरक शिक्षा प्राप्त करने के अधिक अवसर मिलेंगे। यह भी कहा जा रहा है कि इससे मदरसों के विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए बेहतर ढंग से तैयार हो सकेंगे। जो धार्मिक शिक्षा के साथ राष्ट्र निर्माण के कार्यों में सहयोग करेंगे।

निस्संदेह, आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, गणित, कंप्यूटर और व्यावसायिक कौशल का समावेश प्रत्येक शिक्षण संस्थान के लिए समय की आवश्यकता है। यदि मदरसों में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा भी उपलब्ध कराई जाए, तो इससे विद्यार्थियों के भविष्य के अवसरों का विस्तार होगा। लेकिन केवल प्राधिकरण के गठन या प्रशासनिक नियंत्रण से शिक्षा की गुणवत्ता स्वतः नहीं बदल जाती। इसके लिए प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक पाठ्यक्रम, पर्याप्त संसाधन, तकनीकी सुविधाएँ और सतत शैक्षणिक सुधार आवश्यक हैं। जोकि मदरसों के पास नहीं होगा क्योंकि मुस्लिम समाज मदरसों को धार्मिक शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता देता है स्कूली शिक्षा के लिए नहीं। फंड न मिलने की दशा मे किस तरह स्कूल के लिए अच्छे टीचर उपलब्ध होगे और किस प्रकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जाएगी इस पहेली का हल भी सरकार को निकालना होगा।

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि जब उत्तराखंड के अनेक सरकारी प्राथमिक विद्यालय स्वयं बुनियादी शैक्षणिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता पर लगातार प्रश्न उठ रहे हैं, और अनेक विद्यालय शिक्षक तथा संसाधनों की कमी से प्रभावित हैं, तब शिक्षा सुधार का प्राथमिक लक्ष्य क्या होना चाहिए? यदि सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पा रही है, तो केवल अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर विशेष ध्यान केंद्रित करने से शिक्षा व्यवस्था की व्यापक समस्याओं का समाधान नहीं होगा।

सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो शिक्षा समाज को जोड़ने, समान अवसर प्रदान करने और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने का माध्यम है। इसलिए किसी भी समुदाय की शिक्षा व्यवस्था में सुधार संवाद, विश्वास और सहभागिता के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल नियंत्रण या हस्तक्षेप की भावना से। यदि किसी समुदाय को यह महसूस हो कि उसकी सांस्कृतिक या शैक्षणिक पहचान पर अनावश्यक प्रभाव डाला जा रहा है, तो इससे अविश्वास की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। और फिर दमनात्मक सोच की मदरसों के बच्चों को पहले स्कूली शिक्षा और स्कूल के बाद अपनी धार्मिक शिक्षा ग्रहण करनी पड़ेगी तो लगभग चौदह घंटे पढ़ाई करके यह मदरसे के मासूम बच्चे मानसिक दबाव में कितने उच्च शिक्षा हासिल कर पाएगे या मानसिक तनाव में जियेंगे।

सांस्कृतिक दृष्टि से भारत विविधताओं का देश है। यहाँ सभी समुदायों को अपनी भाषा, संस्कृति और शैक्षणिक परंपराओं को संरक्षित रखने का अधिकार प्राप्त है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि सभी शिक्षण संस्थान संविधान में निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवैधानिक मूल्यों, राष्ट्रीय एकता और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा दें। भारतीय संस्कृति की व्यापक और समावेशी परंपरा सभी समुदायों के सम्मान और सहभागिता पर आधारित है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य किसी एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण को थोपना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में संविधान, सहिष्णुता, विविधता के सम्मान और आलोचनात्मक चिंतन की भावना विकसित करना होना चाहिए।

कानूनी दृष्टि से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार प्रदान करते हैं। साथ ही राज्य को शिक्षा की गुणवत्ता, बाल अधिकारों और राष्ट्रीय शैक्षिक मानकों के अनुरूप नियमन करने का भी अधिकार है। इसलिए सरकार और अल्पसंख्यक संस्थानों के बीच संतुलन, संवाद और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन अत्यंत आवश्यक है। कोई भी नीति ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे संवैधानिक अधिकारों और शिक्षा सुधार के उद्देश्य के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो।

सबसे महत्वपूर्ण पक्ष विद्यार्थियों की मनोदशा का है। यदि शिक्षा के वातावरण में अनावश्यक वैचारिक विवाद, पहचान का संकट या सांस्कृतिक असुरक्षा का भाव उत्पन्न होता है, तो उसका सीधा प्रभाव विद्यार्थियों के आत्मविश्वास, सीखने की क्षमता और मानसिक विकास पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि उन्हें आधुनिक शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण संसाधन, समान अवसर और अपनी सांस्कृतिक पहचान के सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर मिले, तो वे समाज और राष्ट्र निर्माण में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।

अतः आवश्यकता इस बात की है कि उत्तराखंड में शिक्षा सुधार को किसी एक वर्ग या संस्थान तक सीमित न रखा जाए। सरकारी विद्यालयों, मदरसों तथा सभी प्रकार के शिक्षण संस्थानों में समान रूप से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाए। शिक्षा का उद्देश्य किसी समुदाय की पहचान को बदलना नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ने का अवसर देना होना चाहिए। जब शिक्षा नीति समानता, गुणवत्ता, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक विश्वास पर आधारित होगी, तभी वास्तविक अर्थों में ऐसे विद्यार्थी तैयार होंगे जो धर्म के जानकार और डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, न्यायविद और जिम्मेदार नागरिक बनकर देश के विकास में योगदान देंगे।

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